प्रेम परिंदा
कल तक एक अदना सा नादान परिंदा था
अपनी में सिमटा लाचार वाशिंदा था
वसन्त में लहराते फूल खिल आये
तुझे देखा तो मेरे पंख निकल आये।
ये तेरा ही जादू था दिल पे
जिगर अटका था तेरे माथे के तिल पे
झटक कर बालों से जब बरखा बरसाती हो
तरस खाओ इस मासूम दिल पे
इतनी बिजलियाँ क्यूँ गिराती हो।
तुझसे बात करने पर होंठ सिल आये
तुझे देखा तो मेरे पंख निकल आये।
गुलाब सी नाज़ुक होंठों की पंखुड़ी जब हिलाती हो
महक इन फ़िज़ाओं में घुलके साँसे उठाती हो
जब भी डूबने का करे मेरा मन
झील सी तेरी अँखियों को खुला रखना
लगा आऊंगा डुबकियाँ गहराई तक
मेरे आने तक आंखें ना बन्द करना।
समंदर के सारे सीप मोती शंख मिल आये
तुझे देखा तो मेरे पंख निकल आये।
चन्द्रhimanshu.uniyal14@gmail.com
अपनी में सिमटा लाचार वाशिंदा था
वसन्त में लहराते फूल खिल आये
तुझे देखा तो मेरे पंख निकल आये।
ये तेरा ही जादू था दिल पे
जिगर अटका था तेरे माथे के तिल पे
झटक कर बालों से जब बरखा बरसाती हो
तरस खाओ इस मासूम दिल पे
इतनी बिजलियाँ क्यूँ गिराती हो।
तुझसे बात करने पर होंठ सिल आये
तुझे देखा तो मेरे पंख निकल आये।
गुलाब सी नाज़ुक होंठों की पंखुड़ी जब हिलाती हो
महक इन फ़िज़ाओं में घुलके साँसे उठाती हो
जब भी डूबने का करे मेरा मन
झील सी तेरी अँखियों को खुला रखना
लगा आऊंगा डुबकियाँ गहराई तक
मेरे आने तक आंखें ना बन्द करना।
समंदर के सारे सीप मोती शंख मिल आये
तुझे देखा तो मेरे पंख निकल आये।
चन्द्रhimanshu.uniyal14@gmail.com

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