अनोखा भाई

रक्षाबन्धन विशेष
*अनोखा भाई*

रानी के कोई नहीं था भाई
अबकी बार भी फिर एक बहना ही आई
माता पिता ने अब कोई संतान ना पाने की कसम थी खाई।
धीरे धीरे बड़ी हो चली थी दोनों बहनें
हमारा कोई भाई नहीं
किसे हम राखी बांधें
हर बार यही थे कहने।
इस राखी पर रानी की ज़िद थी
मुझे भाई बनाना है
रेशमधागा मुझे बांधना है
अब माँ के सब्र की हद थी।
कहा अम्बा ने- जा;
बाहर जा के आम्रवृक्ष को दे राखी बांध
रानी हुई बड़ी खुश
पेड़ को राखी बांध अपना भाई बनाया
जा अपने दोस्तों में बता दी सबको यह बात
सबने मज़ाक बड़ा बनाया
चिढ़ा चिढ़ा कर खूब रुलाया
सहम के रानी घर चली आई।
अब मौसम पतझड़ का आया
पेड़ों के पत्तों ने झड़कर
गुवाड़ी की नाली में जाम लगाया
गांव के लोगों ने सब पेड़ों को काटने का मन बनाया
कटते कटते अब रानी के भाई का नम्बर आया
रानी ने लगाई चीख पुकार
पेड़ को दोनों हाथों पकड़ कस के गले लगाया
ऐसे उसने अपने भाई के प्राणों को बचाया।
अब आया मौसम बारिश का
आ चुकी थी बाढ़ जिसमें गाँव के छोटे छोटे बह गए घर
बाकी सब घरों में भर गया था पानी
पूरा गांव था चिंतित रो रही थी रानी
अब बारी थी भाई के फ़र्ज़ की जो उसने निभाया
रानी समेत परिवार पूरा आम्रवृक्ष पे चढ़ आया
अपने विशाल गात्र से उसने था परिवार बचाया
बाकी गांव भी धीरे धीरे उसकी शरण में आया।
रानी के अनोखे भाई ने सबकी जान बचाई
वृक्ष हमारे संरक्षक हैं सबको सीख सिखाई।।

*#चन्द्र*
राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित "रोचिका शर्मा" की गद्य रचना का पद्य रूपांतरण

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