बारिश

बारिश

बचपन में बड़ी अच्छी लगती थी
बारिश में भीगना बड़ा भाता था
मस्त बालपने में खेलने का आसरा थी
ये बारिश नाव और जहाज तैराने की ख्वाहिश थी।
अब जब चीजें गौर करने लगा हूँ तो सुनता हूँ
बारिश की नन्हीं बून्दें भी कुछ कह जाती हैं
ये बस यूँ ही नहीं बह जाती हैं।
दिन भर की भागदौड़
और ज़माने भर की गूंज में
दब जाता है इसका नाद
इसे देखकर बचपन हो उठता है याद।
सुनसान निशा इसका दर्द बयां करने में
इसका साथ निभाती है
सब सन्नाटे के लिहाफ में लिपटे खोये निद्रा में
तब ये चुपके से बरस के मुझे जगाती है।
सुन पाता हूँ मैं इसका दर्द
टिप टिप करके सुनाती है
कहती है नहीं है मुझे
नालों में , सड़कों में व्यर्थ बहना
यही कर्त्तव्य तुम्हारा है
तुम्हें है मुझको बचाना।।

चन्द्र


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