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अध्यापक

अध्यापक..... सुनने में छोटा सा पर बहुत कुछ छुपा है इसमें। इसमें अनुशीलन है, सारी विद्याओं का विलयन है। जब शिष्य बात ना माने तो धैर्य है, क्रोध में बिना हाथ उठाये परिपूर्ण शौर्य है। अनुभव है, अभ्यास है, ज्ञानधाराओं का विन्यास है। आचार है, विचार है, भावों का नवसंचार है। जलधि सा गम्भीर है, दुर्ग का प्राचीर है। तम शत्रु को गया लील है, वाग्घरी सा वाक्कील है। कर्तव्यों में निश्छल है, कठिनाई का नित हल है। पर्वत सा है उन्नत वो, फलद वृक्ष सा अवनत भी। शिष्ट समाज का निर्माता है, सघन धूप में छाता भी। चन्द्र विश्व अध्यापक दिवस की आप सभी को हार्दिक बधाई। एक व्यक्ति के जीवन को दिशा देने में अध्यापकों का अहम योगदान होता है। इसीलिए अध्यापक होने की ज़िम्मेदारी भी बहुत बड़ी होती है। एक अच्छा अध्यापक बनने के लिए किन गुणों की आवश्यकता होती है। #अध्यापकदिवस #worldteachersday #yqdidi #challenge       #YourQuoteAndMine Collaborating with  YourQuote Didi Follow my writings on https://www.yourquote.in/himanshuuniyal14 #yourquote

इतना मुश्किल भी नहीं है खुश रहना

*स्वरचित कृति* शीर्षक : *इतना मुश्किल भी नहीं है खुश रहना*  इतना मुश्किल भी नहीं है खुश रहना। तुम अपनी बाधाएं मुझे दो मैं उन्हें पार करने को तुम्हें सीढियाँ बना के दूँगा। जिसके बदले में तुमसे बस एक मुस्कान ही लूँगा। क्योंकि मुझे आता है सबकी खुशियों की नदी के साथ बहना। इतना मुश्किल भी नहीं है खुश रहना।। जब कभी दर्द बाहर ना निकल रहा हो अपने आँसुओं को दुनियाँ की सैर करा आना। वो घूम के आएंगे तो सुकूँ की खुशबू उनके साथ लाना कोई दुःख में हो तो "सब ठीक हो जाएगा" चार शब्द बड़े प्यार से कहना क्योंकि इतना मुश्किल भी नहीं है खुश रहना।। अपने अहम के पदवेशों को दरवाजे की दहलीज़ पे ही खोल आना चाहत के चोले को अपने तन पे ओढ़ आना कानों को  नैतिक मूल्यों के कुण्डलों से बिंधवा लेना नैनों में प्यार का चश्मा चढ़ाना रसना से बातों की चाशनी को चाट आना सही मायने में है यही असल गहना इसलिए इतना मुश्किल भी नहीं है खुश रहना।। *चन्द्र*

अभिनय

स्वरचित कृति। *अभिनय* *----------* जीवन क्या है !! एक मंच ही तो है वही मंच जिसपे अलग अलग किरदार करते हैं अभिनय अपने अपने काम में दक्ष रोज़मर्रा में निभाते हैं किरदारी एक दूसरे से होता है अनुनय विनय अपने पात्र की अदा करते हैं ज़िम्मेदारी जो सामने होता है उसी के मुताबिक़ ओढ़ लेते हैं छौना फिर होता है रूपांतरण भावों का बातों का और विचारों का अंतरण मंच पे होता है जिसका अभिनय अच्छा जो छूता है दर्शक मन को वही आगे बढ़ता जाता है प्रशंसकों के दिलों में घर करता जाता है पाता है धन को हक़ीक़त भले कुछ और हो पर बड़ी बात है अभिनय जीवनमंच भी ऐसा ही मन में जो हो पर अभिनय से सामने वाले का दिल जीत ले झूठा ही सही बना अपना मीत ले वही तो जीवनमंच में बढ़ता आगे है बाकी तो सब पीछे भागे है। *#चन्द्र*

अनोखा भाई

रक्षाबन्धन विशेष *अनोखा भाई* रानी के कोई नहीं था भाई अबकी बार भी फिर एक बहना ही आई माता पिता ने अब कोई संतान ना पाने की कसम थी खाई। धीरे धीरे बड़ी हो चली थी दोनों बहनें हमारा कोई भाई नहीं किसे हम राखी बांधें हर बार यही थे कहने। इस राखी पर रानी की ज़िद थी मुझे भाई बनाना है रेशमधागा मुझे बांधना है अब माँ के सब्र की हद थी। कहा अम्बा ने- जा; बाहर जा के आम्रवृक्ष को दे राखी बांध रानी हुई बड़ी खुश पेड़ को राखी बांध अपना भाई बनाया जा अपने दोस्तों में बता दी सबको यह बात सबने मज़ाक बड़ा बनाया चिढ़ा चिढ़ा कर खूब रुलाया सहम के रानी घर चली आई। अब मौसम पतझड़ का आया पेड़ों के पत्तों ने झड़कर गुवाड़ी की नाली में जाम लगाया गांव के लोगों ने सब पेड़ों को काटने का मन बनाया कटते कटते अब रानी के भाई का नम्बर आया रानी ने लगाई चीख पुकार पेड़ को दोनों हाथों पकड़ कस के गले लगाया ऐसे उसने अपने भाई के प्राणों को बचाया। अब आया मौसम बारिश का आ चुकी थी बाढ़ जिसमें गाँव के छोटे छोटे बह गए घर बाकी सब घरों में भर गया था पानी पूरा गांव था चिंतित रो रही थी रानी अब बारी थी भाई के फ़र्ज़ की जो उसने निभाया...

बारिश

बारिश बचपन में बड़ी अच्छी लगती थी बारिश में भीगना बड़ा भाता था मस्त बालपने में खेलने का आसरा थी ये बारिश नाव और जहाज तैराने की ख्वाहिश थी। अब जब चीजें गौर करने लगा हूँ तो सुनता हूँ बारिश की नन्हीं बून्दें भी कुछ कह जाती हैं ये बस यूँ ही नहीं बह जाती हैं। दिन भर की भागदौड़ और ज़माने भर की गूंज में दब जाता है इसका नाद इसे देखकर बचपन हो उठता है याद। सुनसान निशा इसका दर्द बयां करने में इसका साथ निभाती है सब सन्नाटे के लिहाफ में लिपटे खोये निद्रा में तब ये चुपके से बरस के मुझे जगाती है। सुन पाता हूँ मैं इसका दर्द टिप टिप करके सुनाती है कहती है नहीं है मुझे नालों में , सड़कों में व्यर्थ बहना यही कर्त्तव्य तुम्हारा है तुम्हें है मुझको बचाना।। चन्द्र
जादूगर हूँ मैं बाज़ीगर नहीं बाज़ी पलट हुनर मुझमें नहीं। मैं तो बस करता हूँ कुछ ऐसा मन को ज़हन को भाए जैसा जादूगर लुटाता है खुशियाँ, देता है सम्भावनाएं और शिक्षा दिखाता है खेल मनोरंजक जीवन का पाठ पढाये जो मैं हूँ एक शिक्षक विद्यार्थी के सिर पे धूप और बारिश से बचाता छाता समाज के जिम्मेदार नागरिक का निर्माता कर्म पथ पे आये कोई बाधा गर जादू से उसे दूर कर मेरा जादू है शिक्षा हूँ मैं एक जादूगर हूँ मैं एक जादूगर।। चन्द्र🌙

प्रेम परिंदा

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कल तक एक अदना सा नादान परिंदा था अपनी में सिमटा लाचार वाशिंदा था वसन्त में लहराते फूल खिल आये तुझे देखा तो मेरे पंख निकल आये। ये तेरा ही जादू था दिल पे जिगर अटका था तेरे माथे के तिल पे झटक कर बालों से जब बरखा बरसाती हो तरस खाओ इस मासूम दिल पे इतनी बिजलियाँ क्यूँ गिराती हो। तुझसे बात करने पर होंठ सिल आये तुझे देखा तो मेरे पंख निकल आये। गुलाब सी नाज़ुक होंठों की पंखुड़ी जब हिलाती हो महक इन फ़िज़ाओं में घुलके साँसे उठाती हो जब भी डूबने का करे मेरा मन झील सी तेरी अँखियों को खुला रखना लगा आऊंगा डुबकियाँ गहराई तक मेरे आने तक आंखें ना बन्द करना। समंदर के सारे सीप मोती शंख मिल आये तुझे देखा तो मेरे पंख निकल आये। चन्द्र himanshu.uniyal14@gmail.com